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लाभचंद मार्केट पूरी तरह वैध : 1940 व 1947 के पंजीकृत पट्टों व स्वीकृत मानचित्रों से सिद्ध है बाजार का विधिसम्मत निर्माण

Pragya News 24

Mon, Feb 16, 2026
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आगरा। राजा मंडी स्थित लाभचंद मार्केट के 25 से अधिक दुकानदारों/किरायेदारों ने सोमवार को कलेक्ट्रेट पहुंचकर जिलाधिकारी अरविंद मल्लप्पा बंगारी को बाजार से संबंधित विस्तृत साक्ष्य एवं ऐतिहासिक दस्तावेज सौंपे। प्रतिनिधिमंडल ने 13 फरवरी 2026 को समय देकर उनका पक्ष सुनने के लिए जिलाधिकारी का आभार व्यक्त करते हुए निर्देशानुसार सभी प्रमाणिक अभिलेख प्रस्तुत किए।

दुकानदारों ने स्पष्ट किया कि प्रस्तुत दस्तावेज यह प्रमाणित करते हैं कि लाभचंद मार्केट की स्थापना एवं निर्माण पूर्णतः वैध, विधिसम्मत और प्रशासनिक स्वीकृतियों के अनुरूप है।

1940 व 1947 के पंजीकृत पट्टों से वैधता स्थापित
प्रतिनिधिमंडल ने वर्ष 1940 में पंजीकृत नजूल पट्टा विलेख की प्रति प्रस्तुत की, जिसमें संलग्न मानचित्र में राजा मंडी रोड की चौड़ाई 16 फीट दर्शाई गई है।

साथ ही वर्ष 1947 में मंडलायुक्त आगरा एवं नगर पालिका प्रशासन के मध्य हुए पत्राचार तथा पंजीकृत पट्टा विलेख की प्रतियां भी सौंपी गईं। इन अभिलेखों से स्पष्ट है कि गहन परीक्षण एवं विचार-विमर्श के पश्चात बाजार विकास की योजना के अंतर्गत भूमि विधिवत पट्टे पर दी गई थी।

मानचित्र में यह भी दर्शाया गया है कि 16 फीट 9 इंच चौड़ी सड़क को 30 फीट तक विस्तारित किया जाना था तथा दोनों ओर 8-8 फीट चौड़े फुटपाथ प्रस्तावित थे।

1946 का नगर अभियंता पत्र और स्वीकृत भवन मानचित्र
दिनांक 11 नवंबर 1946 को नगर अभियंता द्वारा जारी पत्र की प्रति भी प्रस्तुत की गई, जिसमें 30 फीट चौड़ी सड़क निर्माण की योजना का उल्लेख है। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि उस समय क्षेत्र के सुनियोजित पुनर्विकास एवं बाजार स्थापना की योजना बनाई गई थी।

वर्ष 1947 में नगर बोर्ड द्वारा स्वीकृत भवन एलिवेशन मानचित्र की प्रति से यह स्थापित होता है कि फुटपाथ एवं सड़क के संगम बिंदु पर खंभों का निर्माण स्वीकृत था, जो आज भी स्थल पर यथावत विद्यमान हैं।

फ्रीहोल्ड परिवर्तन से स्वामित्व स्थिति स्पष्ट
वर्ष 1999 में नजूल पट्टे के फ्रीहोल्ड में परिवर्तन की प्रति भी जिलाधिकारी को सौंपी गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि पीछे की पट्टी की भूमि विधिवत फ्रीहोल्ड में परिवर्तित होकर स्वामित्व में आ चुकी है।

दिनांक 02 फरवरी 2026 को राज्य पक्ष के अधिवक्ता द्वारा ईमेल से भेजे गए सार-संक्षेप की प्रति भी प्रस्तुत की गई, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि भूमि दो भागों से मिलकर बनी है—एक भाग 1947 में नगर पालिका द्वारा पट्टे पर दी गई भूमि तथा दूसरा भाग स्वामित्व वाली फ्रीहोल्ड भूमि है, परंतु वह सार-संक्षेप की प्रति सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रस्तुत नहीं की गई। दुकानदारों ने कहा कि यह तथ्य स्वयं सिद्ध करता है कि संपूर्ण भूमि को शासकीय बताना तथ्यात्मक रूप से गलत है।

न्यायालयीन अभिलेखों से भी स्थिति स्पष्ट
प्रतिनिधिमंडल ने वर्ष 1953 में प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश की प्रति भी सौंपी, जिसमें मूल पट्टाधारी को बरी किया गया था। इससे यह सिद्ध होता है कि उस समय नगर बोर्ड निर्माण गतिविधियों के प्रति अत्यंत सतर्क था।

साथ ही 07 जनवरी 2025 के उच्च न्यायालय आदेश की प्रति भी प्रस्तुत की गई, जिसमें स्पष्ट उल्लेख है कि संबंधित रिट याचिका “वापसी के रूप में निरस्त” की गई थी। दुकानदारों ने आरोप लगाया कि कुछ प्रस्तुतियों में इसे गुण-दोष के आधार पर निस्तारित दर्शाकर भ्रामक चित्र प्रस्तुत किया गया।

ये हैं प्रमुख मांगें
पुष्पेंद्र तोमर, अनूप गुप्ता, वीरेंद्र शर्मा, अभिषेक जैन, वासुदेव, सुधीर नाहर, सनी राजपूत, आरसी गुप्ता आदि दुकानदारों ने जिलाधिकारी से निवेदन किया कि
• वास्तविक अभिलेखों के आधार पर यह निष्कर्षित किया जाए कि सड़क चौड़ीकरण एवं फुटपाथ निर्माण पूर्व स्वीकृत योजना के अनुरूप हुआ है और वर्तमान में कोई अतिक्रमण नहीं है।
• नगर निगम को पट्टा समाप्ति आदेश निरस्त करने हेतु निर्देशित किया जाए।
• मृत व्यक्तियों के हस्ताक्षरों के दुरुपयोग की जांच कराई जाए।
• न्यायालय के समक्ष तथ्यात्मक त्रुटियों के लिए जिम्मेदार पक्षों पर आवश्यक कार्रवाई की संस्तुति की जाए।

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