विश्व स्तनपान सप्ताह : जीवन की मजबूत शुरुआत का आधार है स्तनपान, 1 से 7 अगस्त तक चलेगा जागरूकता अभियान
Pragya News 24
Sat, Aug 1, 2026
आगरा। जिले में 1 से 7 अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाएगा। इस दौरान गर्भवती महिलाओं एवं हाल ही में प्रसव कराने वाली माताओं को नवजात शिशुओं के लिए स्तनपान के महत्व से अवगत कराया जाएगा। इस वर्ष की थीम "जीवन की स्थायी शुरुआत के लिए स्तनपान: जो कारगर है उसे मजबूत करें" निर्धारित की गई है।
सप्ताहभर स्वास्थ्य विभाग द्वारा विभिन्न जागरूकता गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा। आशा, एएनएम एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मी घर-घर और स्वास्थ्य संस्थानों पर महिलाओं को जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने तथा शिशु को छह माह तक केवल मां का दूध पिलाने के लिए प्रेरित करेंगी।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण श्रीवास्तव ने बताया कि विश्व स्तनपान सप्ताह का उद्देश्य माताओं को स्तनपान से जुड़ी भ्रांतियों से मुक्त करना तथा प्रत्येक नवजात के स्तनपान के अधिकार के प्रति जागरूक करना है। उन्होंने कहा कि जीवन के पहले छह माह तक केवल मां का दूध ही शिशु के संपूर्ण पोषण के लिए पर्याप्त होता है।
डिप्टी सीएमओ (आरसीएच) डॉ. सुरेंद्र मोहन प्रजापति ने बताया कि स्तनपान से शिशु का बौद्धिक विकास बेहतर होता है तथा मां और बच्चे के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है। इससे दस्त, निमोनिया, कान एवं गले के संक्रमण सहित कई बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। मां के दूध में प्रोटीन, वसा, कैलोरी, लैक्टोज, विटामिन, आयरन, खनिज, पानी और एंजाइम संतुलित मात्रा में उपलब्ध होते हैं, जो शिशु के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक हैं।
जिला महिला अस्पताल की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. खुशबू केसरवानी ने बताया कि नवजात के लिए मां का पहला गाढ़ा पीला दूध अमृत के समान होता है और इसे जन्म के तुरंत बाद अवश्य पिलाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जन्म से छह माह तक शिशु को केवल मां का दूध ही दिया जाना चाहिए। इस अवधि में पानी, शहद, घुट्टी, गाय या भैंस का दूध, जूस अथवा अन्य कोई तरल या ठोस आहार देने की आवश्यकता नहीं होती। गर्मियों में भी मां का दूध शिशु के शरीर में पानी की जरूरत पूरी करने में सक्षम होता है।
स्तनपान के प्रमुख लाभ
जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू करें।
छह माह तक केवल मां का दूध दें।
दस्त, निमोनिया एवं संक्रमण से सुरक्षा मिलती है।
शिशु का मानसिक एवं शारीरिक विकास बेहतर होता है।
मां और शिशु के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत होते हैं।
छह माह तक पानी, शहद, घुट्टी, जूस या अन्य आहार की आवश्यकता नहीं होती।
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